अच्छा है (Achchaa Hai)

सलीब अपने सर उठा चलना
कहाँ मुझे रास था
तेरे जूनून की चादर से
मगर फिर भी यह हल्का है

मेरे सर पर छत ना सही,
बे-शक़ फाका-मस्ती ही सही आज
तेरी हसरतों की ओस से भीगता,
जाम पर आज भी छलका है

मुझे कब गवारा था
यूँ ख़ामोशी का सादिक़ होना
तेरी चाहत का है यह दस्तूर,
तो चलो यह भी अच्छा है

Translated loosely as:

I never wanted to walk about bearing the cross
It still feels lighter than the shroud of my obsession

Even if I wander without a roof & empty handed
My goblet still brims with dew of my desire for you

I never wanted to be friends with this silence
But, if this is the way to woo you, even this is good.

One Response

  1. How do we know says:

    “तेरे जूनून की चादर से
    मगर फिर भी यह हल्का है” – very true!

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