काँच की बूँदें (Kaanch Ki Boondein)

तेरे दामन के अर्श से चल कर

ज़ख्मों की हरी टहनियों से छन
ख़्वाबों की छतों से टपकी
मेरे सीने की राख भिगोने
उतर आई फिर आँखों में
बरसती जलती काँच की बूँदें
इन बूँदों से घाव नहीं धुलते
नहीं मिट पाते यह हर्फ़ लकीरें
हैं दाग यह  और गहराती
और भड़काती हैं यह लपटें
मेरे खून के  से गहरी
तेरी  चूड़ियों के काँच की बूँदें
उतर आई फिर आँखों में
बरसती जलती काँच की बूँदें
इन बूँदों को तुम क़ैद ही रखना
अपनी पलकों की सीपियों में
देखना यह ना देखें उजाले
ना उतरें यह हाथों पे गिर कर
बनें ना जीनत यह गालों की
रह जाएँ बस यह गले में घुट कर
फुगाँ कहीं इनमें ना झलके
उतर आई फिर आँखों में
बरसती जलती काँच की बूँदें
मेरी अमानत हैं यह तुम पे
रखना तुम इन्हें संभाले
वस्ल तक इन्हें छुपाये रखना
कोशिश हो, कोई निगाह ना डाले
बे-मौके दरीचों पे दस्तक देती
काजल की यह काली बूँदें
उतर आई फिर आँखों में
बरसती जलती काँच की बूँदें
किसी दिन यह आसमान चीरेंगी
बरसातों में यह भीगेंगी
तेरे मेरे वजूद में सिमटी
साँसों से यह फिर उभरेंगी
ज़र्रे-ज़र्रे को महका देंगी
कस्तूरी यह शबनमी बूँदें
उतर आई फिर आँखों में
बरसती जलती काँच की बूँदें

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