शब को रोज़ (Shab Ko Roz)

शब को रोज़ जगा देता है
कैसी ख्वाब सजा देता है
मुझे बंद कमरे में रख
क्यों तू पंख लगा देता है
रूह में जब मैं ढलना चाहूँ
तू एक जिस्म बना देता है
जब भी पूछों मैं हाल उसका
मेरी ही ग़ज़ल सुना देता है
——My Extension———
पल पल भारी रात कटती है
तू उम्र क्यों मेरी बढा देता है
ज़रा मैं एक दर्द भुलाता हूँ

वो ज़ख्म नया लगा देता है
तू मुझ से यूँ लाख पर्दा कर
वो तेरा सामना करा देता है
दिन भर साँस धुंआ होती है
दिल ऐसी आग जला देता है
रगों में लहू ज़रा थमता है
वो हौसला फिर जगा देता है

चाहे कितना मैं मुड़ कर जाऊं

वो फिर आवाज़ लगा देता है

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