क़र्ज़ (Karz)

तुम में, मुझ में जो समय था

उन पलों की जमा-पूँजी से
अब यादों का सूद आता है
मैं कतरा-कतरा जोड़ रहा हूँ
लम्हा-लम्हा बचा रहा हूँ
तुम्हारे खतों की एक गुल्लक
और लफ़्ज़ों के कुछ सिक्के हैं
तुम्हारे दुप्पट्टे की गांठों में
मैंने सिरहाने छुपा रखे हैं
मैं पुर्ज़ा-पुर्ज़ा समेट रहा हूँ
दिन और पन्ने जला रहा हूँ
हँसने रोने के बही-खाते
और अपने रिश्ते-नाते
बकाया निकलते हैं मुझ पर
कुछ मेरे दिन, कुछ तेरी रातें
मैं हिस्सा-हिस्सा बिक रहा हूँ
किस्सा-किस्सा लुटा रहा हूँ
मेरे ज़हन में दर्ज़ तसवीरें
जाने कब से सहेज रखी थी
इन तस्वीरों के जुड़ते ब्याज से
अब साँसों की किश्त जाती है
मेरे तुम्हारे बीच उस वक़्त का
मैं अब तक हिसाब लगा रहा हूँ
कुछ तेरा, कुछ अपना बाकी
मैं यह क़र्ज़ चुका रहा हूँ

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