देखता हूँ (Dekhtaa Hoon)

देखता हूँ,
कि तुम देखती हो.
उस दिन हम शायद
यहीं कहीं तो बैठे थे
बहते पानी में पाँव डाले
मेरे काँधे तुम्हारा सर रखे
तुमने हाथों से पानी में
नाम कुछ यूँ ही लिखे थे
यह नीला प्रतिबिम्ब कहीं
पत्थरों पे छप गया है
सोचता हूँ
इन लहरों पर छोड़ी
तुम्हारी उंगलियाँ साथ ले चलूँ
पानी की यह अतृप्त बूँदें
तुम्हारे स्पर्श सी छलती हैं
मैं अंजलि में तुम्हारा हाथ भर
अपनी आँखों तक ले आता हूँ
मेरी उँगलियों से छन कर,
तुम फिर क्यों बह जाती हो
धारों के कांच के परे
देखता हूँ,
कि तुम देखती हो
उस दिन तुम कुछ कह रही थी
बात रह गयी थी कुछ बाकी
क्या कुछ बोल रहे अधूरे
या सिर्फ मेरा मौन था बाकी
तुम अपनी ख़ामोशी की
एक अदना चिट्ठी लिख भेजो
मैं अपने लिफ़ाफ़े में तुम्हें एक
सांस की दूरी भेजूंगा
सांझ – प्रभात की विडम्बना
और कुछ सवाल लिखूंगा
तुम्हारे बिगड़ने – मनाने
का बाकी हर मलाल भेजूंगा
तुम्हारी चुप्पी का जवाब लिखते
देखता हूँ ,
कि तुम देखती हो.
पिछली रात, सफ़ेद चादरें
चांदनी में भीगने डाली थीं
सुबह की ओस में इन्हें मैं
छत पर ही छोड़ आया हूँ
तुम इन्द्रधनुष में ब्रुश डुबो,
इन्हें अपनी आँखों सा रंग लेना
मैं दिन ढले इन्हें ले जाऊंगा
अपनी आखिरी नींद से पहले
इन्हें ओढ़, मैं फिर जगने तक
इन सलवटों में तुम्हें सहेजूंगा
मुझ से पहले जो तुम जागो
तो मैं यहीं सोया मिलूंगा
सपनों की मरीचिका जीते
देखता हूँ,
कि तुम देखती हो

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