मुलज़िम (Mulzim)

दिल के धड़कने का नाम इंतज़ार रख दिया
बरसते पानी को इंतकाम कर दिया
मुन्तजिर नहीं मैं अब तेरी रहनुमाई का
जा खुद तुझे मैंने मुलज़िम करार कर दिया

वस्ल साँसों का भी जहां तक़लुफ़्फ़ लगे
अर्श का अब वो मुकाम कर दिया
उम्मीद जो कोई बच गयी थी कहीं
काम उसका भी तमाम कर दियाबरसों नहीं आई खबर खुद से मिलने की

शाम ढली तो नज़र सलाम कर दिया
फ़िक्र इतनी रही मेरी खैरियत की उन्हें
उदु के हाथ ही पैगाम कर दिया
दो पल जो ठहरा उनके दर पर मैं
उम्र भर का सामान साथ कर दिया
और बिन कहे ही ले ली रुखसत मुझसे
अपना साया भी मेरे हाथ कर दिया
बे-सबब तो यूँ इतना मैं पहले भी ना था
मुरीदी ने तेरी जितना मुझे अब कर दिया
मुन्तजिर नहीं मैं अब तेरी रहनुमाई का
जा खुद तुझे मैंने मुलज़िम करार कर दिया

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